
– सरकारों ने घर को धरोहर के रूप में चिन्हित करने की जरूरत नहीं समझी
लखनऊ: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म 1864 में रायबरेली के दौलतपुर गांव में हुआ था। आर्थिक स्थिति ठीक न होने से उन्होंने स्वाध्याय से ही संस्कृत, बांग्ला, मराठी, फारसी, गुजराती, अंग्रेजी आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया और पत्र-पत्रिकाओं में अपनी छाप छोड़ी। बाद में उन्होंने हिंदी भाषा को नया रूप दिया। जिस स्थान पर आचार्य का जन्म हुआ था वह वीरान पड़ा है। गांव के लोगों को भी अफसोस है कि आचार्य की पैत्रक मकान को धरोहर के रूप में चिन्हित नहीं किया गया। जबकि रायबरेली ही नहीं देश और दुनिया के लिए दौलतपुर गांव किसी स्मारक के कम नहीं है।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने शुरू से ही मुश्किल दौर का जीवन बिताया और जिस दौर में आचार्य ने हिंदी को स्थान देने की ठानी उस दौरान हिंदी के बहुत बुरे दिन थे। इस पर भी आचार्य ने हिम्मत नहीं हारी और हिंदी को अन्य भाषाओं के आगे करने का काम कर दिखाया। आज दुनिया भर में हिंदी को लेकर डिबेट होती है। ऑक्सफोर्ड हो या कैंब्रिज विश्वविद्यालय हिंदी पर एक अनिवार्य लेक्चर दिया जा रहा है। लैटिन, स्पेनी और इंग्लिश की तरह हिंदी भी दुनिया में अपना प्रभाव जमा रही है। यह सब आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के कठिन कार्यों का नतीजा है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के पश्चात आचार्य दूसरे प्रवर्तक साहित्यकार के रूप में विख्यात हुए। सरस्वती के संपादक के रूप में इन्होंने हिंदी साहित्य की अमूल्य सेवा की। तत्कालीन साहित्य, भाषा और शैली में इन्हें जो त्रुटियां और कमियां दिखाई दीं, उसे सरस्वती के माध्यम से उन्हें दूर करने का अथक प्रयास किया। इन्होंने प्रतिभासंपन्न नए लेखकों को प्रेरित किया और उनके साहित्य में सुधार किए। उनके द्वारा संपादित सरस्वती पत्रिका वास्तव में इस युग की साहित्यिक चेतना का प्रतीक बन गई थी। आचार्य ने 50 से अधिक ग्रंथों और लेखों की रचना की। आचार्य संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे लेकिन वे निबंधों में केवल संस्कृत के शब्दों को ही रखने के पक्षपाती नहीं थे। इन्होंने अन्य भाषाओं के लोकप्रचलित शब्दों के प्रयोग को भी मैं तो प्रदान किया। कहीं उनकी भाषा बोलचाल के बिल्कुल निकट है तो कहीं शुद्ध साहित्य का और क्लिष्ट संस्कृतमयी। उन्होंने अपनी बात को प्रभावी बनाने तथा विषय की गहराई तक पहुंचने के लिए संस्कृत की सूक्तियों का प्रयोग भी किया है। साथ ही लोकोक्तियों और मुहावरों से अपनी भाषा का श्रंगारकर उसे प्रभावशाली बनाया। वह विषय के अनुसार भाषा का प्रयोग करने में पारंगत थे। बताते हैं कि सरस्वती के संपादन से निवृत्त होने के बाद अपनेे जीवन के अंतिम वर्ष उन्होंने नाना कठिनाइयों के बीच अपने गांव दौलतपुर में ही काटे।
जब महिला का जीवन बचाने के लिए उतार दिया था जनेऊ
महाव्याधि की तरह फैली छुआछूत की बीमारी के तो वे बड़े ही मुखर विरोधी थे। कहते हैं कि एक बार उनके गांव के धर्माधीशों की निगाह में अस्पृश्य दलित महिला के पैर के अंगूठे में जहरीले सांप ने डस लिया तो वहां उपस्थित द्विवेदी जी को जहर को महिला के शरीर में चढ़ने से रोकने और उसका जीवन बचाने का तत्काल कोई और रास्ता नहीं दिखा तो उन्होंने झट अपना जनेऊ उतारा और उसके अंगूठे में कसकर बांध दिया।
सोनिया गांधी ने प्रतिमा का किया था अनावरण
आचार्य के गांव में कोई प्रतीक स्तंभ तो नहीं बन सका लेकिन 2010 में सोनिया गांधी ने दौलतपुर गांव में प्रतिमा का अनावरण किया था। एक पुस्तकालय भी गांव में बनाया गया है लेकिन सरकार के स्तर से कोई ऐसा काम नहीं हुआ जो दौलतपुर को देश के फलक पर चमका सके। आचार्य ने हिंदी के लिए सब कुछ लगा दिया और आज उन्हीं के गांव को भुला दिया गया है। पिछले दो साल से गांव से बस सेवा बंद है। अभी तक बस सेवा शुरू नहीं हो सकी है। सरकारें पर्यटन पर लाखों रुपये खर्च करती रही हैं लेकिन आचार्य के गांव और उनके पैत्रक निवास पर एक धेला नहीं लगाया गया।
निराला से लेकर चंद्रशेखर आजाद तक घर आए थे
उन्नाव से जुड़े लोग बताते हैं कि आचार्य के घर पर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला भी दो-तीन बार आए थे तो वहीं देश की आजादी के दौर में चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह भी आचार्य से मिले थे। जब चंद्रशेखर आजाद को पुलिस ढूंढ रही थी तो वह आचार्य के घर पर उनसे मिलने के बाद प्रयागराज निकले थे। यही कारण था कि आचार्य का घर भी अंग्रेज अफसरों की निगाह में रहता था लेकिन किसी अंग्रेज अफसर की उनसे बात करने की हिम्मत कभी नहीं हुई।
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