
लखनऊ: कल से दिल्ली में जी-20 समिट शुरू होने जा रहा है लेकिन चीन और रूस के राष्ट्राध्यक्षों के न आने से कई सवाल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में खड़े हो गए हैं। भले ही इनको अभी तवज्जो न दी जाए लेकिन इसका परिणाम रूस तथा चीन के बीच चल रही किसी योजना का अक्स के रूप में सामने आएगा। पुतिन और शी जिनपिंग दो ऐसे नेता हैं जो खुद को अपने-अपने देशों में सर्वोच्च घोषित कर चुके हैं। एक तरह से देखा जाए तो रूस और चीन में मौजूदा समय में कोई गणतंत्र नहीं है। काम्युनिस्ट झंडा फहरा रहा है जिसके आगे वहां के संविधान की कोई पताका नहीं है। दिल्ली को पहली बार जी-20 समिट की मेजबानी मिली है और पुतिन और शी के न आने से समिट के रिजल्ट बहुत बड़े नहीं होंगे। असल में रूस और चीन आपसी जुगलबंदी को छोड़ नहीं रहे हैं और इसकी टीस पश्चिमी देशों और अमेरिका को है। भारत भी अछूता नहीं है। चीन का रुख जिस तरह से अक्साई चीन और अरुणांचल प्रदेश को लेकर है तो साफ करता है कि चीन हठ पर है। वहीं खुलेतौर पर तो नहीं लेकिन अंदरूनी तौर पर पुतिन की भी शह है। भारत हमेशा से अरुणांचल और अक्साई चीन के मुद्दे को लेकर अपनी बात कहता रहा है और रूस के राष्ट्राध्यक्ष को भी स्थितियां भलीभांति पता हैं उसके बाद भी पुतिन ने कभी भी शी जिनफिंग पर कोई दवाब नहीं डाला। डोकोलॉम हो या फिर तवांग जब भी भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ा तो रूस की तरफ से कभी भी कोई एक संदेश सामने नहीं आया तो चीन को चेतावनी देने वाला हो। जी-20 समिट में पुतिन और शी के न आने का एक बड़ा कारण यह भी है कि कॉमरेड यूक्रेन के मुद्दे पर जी-20 के अन्य देशों का सामना करने को तैयार नहीं है। हालांकि यह जरूर था कि यदि पुतिन और शी आते तो यूक्रेन के साथ अरुणांचल के मुद्दे पर कोई सकारात्मक बात होती लेकिन दोनों राष्ट्राध्यक्ष पूर्वनियोजित तरीके से जी-20 समिट से अलग हो गए। समिट में पुतिन और शी के न आने से यह भी साफ है कि दोनों देश एशिया और यूक्रेन में चल रहे तनाव को लेकर कतई संजीदा नहीं है। खासकर चीन जो ताइवान पर सैनिक कार्रवाई का दंभ भरता रहता रहा है।
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